औरंगाबाद वर कविता

औरंगाबाद की यादें  क्यों अच्छा लगती है।

वो "म्हैसमाळ " की हवा,
वो "घाटी " की दवा,

वो " गायकवाड"  की टिचींग
और 
"  प्रोझोन " की शाँपींग,

वो " छोटू " का वडा
वो "हलवाई "का पेढा
" चौपाटी " की भेल और
वो "दोस्ती " का खेल

" पैठण गेट "  की जलेबी
 "  क्रांती चौक "  का शेक,
और
 " क्रेझी बाईट" का केक,
वो "  बरकत "  की चाय

वो " पोलीस"  का धाक
जहाँ " आपुनकी"  की छाप

वो " दौलताबाद, खुलताबाद " की यात्रा
और
वो "कर्णपुरे " की जत्रा

वो "देवगिरी, छत्रपती कॉलेज " की सडके,
जहा कितने "दिल" धडके,

ऐसी है कुछ हमारे " औरंगाबाद " की "यादे " जो भुलाई नही जाते...
😃☺😊

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