देवी स्तोत्र

🔥ॐ दुं दुर्गायै नमः।।🔥
🌓देवीस्तोत्रम्-:🌓

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🌺श्रीभगवानुवाच🌺

नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः।
कल्याण्यै कामदायै च वृद्धयै सिद्धयै नमो नमः।।
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भगवान् विष्णुने कहा-:
प्रकृति एवं विधात्री देवीको मेरा निरन्तर नमस्कार है। कल्याणी, कामदा, वृद्धि तथा सिध्धि देवी को बार-बार नमस्कार है।।
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सच्चिदानन्दरुपिण्यै संसारारणये नमः।
पञ्चकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः।।
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सच्चिदानन्दरुपिणी तथा संसार की जननी स्वरुपा देवीको नमस्कार है। आप पंचकृत्य* विधात्री तथा श्री भुवनेश्वरी को बार-बार नमस्कार है।।
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सर्वाधिष्ठानरुपायै कूटस्थायै नमो नमः।
अर्धमात्रार्थभूतायै ह्रल्लेखायै नमो नमः।।
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समस्त संसार की एकमात्र अधिष्ठात्री तथा कूटस्थरुपा देवीको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मानन्दमयी अर्धमात्रात्मिका एवं ह्रल्लेखारुपिणी देवी को बार-बार नमस्कार है।।
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ज्ञातं मयाऽखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं
त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य।
शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा
ज्ञाताऽधुना सकललोकमयीति नूनम्।।
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हे जननी! मैने जान लिया की यह समस्त विश्व आपमें समाहित है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि एवं संहार भी आप ही करती हैं। इस ब्रह्माण्ड के निर्माण में आपकी विस्तृत प्रभावशाली शक्ति ही मुख्य हेतु है, अतः मुझे अब ज्ञात हो गया है की आप ही सम्पूर्ण लोकमें व्याप्त हैं।।
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विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं
सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले।
तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च
भासीन्द्रजालमिव नः किल रञ्जनाय।।
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इस सत् एवं असत् रुप सम्पूर्ण जगत् का विस्तार करके उस चिद्-ब्रह्म पुरुष के समक्ष यथा समय आप इसे समग्ररुप से प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार अपनी प्रसन्नता के दिये सोलह तथा अन्य सात तत्त्वों के साथ आपकी क्रीडा हमें इन्द्रजाल के समान मनोरंजनकारिणी प्रतीत होती हैं।।
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न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति
व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थिताऽसी।
शक्तिं विना व्यवह्रतो पुरुषोऽप्यशक्तो
बम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन।।
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हे जननि! आपसे रहित यहाँ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती; आप ही समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित रहती हैं। बुद्धिमान् पुरुषों का कथन है कि आपकी शक्ति के बीना वह परमपुरुष भी कुछ भी करनें में असमर्थ हैं।।
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प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावैः
स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि।
अस्त्येव देवि तरसा किल कल्पकाले
को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य।।
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हे माता! आप अपने कृपाप्रभाव से सारे संसार का सदा कल्याण करती हैं। हे देवि! आप ही अपने तेज से सृष्टिकाल में सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती हैं तथा प्रलयकाल में इसका शीघ्र ही संहार कर डालती हैं। हे देवि! आपके वैभव के लीला-चरित्र को भलीभाँति जानने में कौन समर्थ है?
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त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां
लोकाश्च ते सुवितताः खलु दर्शिता वै।
नीताः सुखस्य भवने परमां च कोटिं
यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम्।।
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हे जननि! मधु-कैटभ नामक दोनों दानवों से आपने हमारी रक्षा की हैं, आपने ही हमलोगों को अपने अनेक विस्तृत लोक दिखायें तथा अपने-अपने भवन में हमें परमानन्द का अनुभव कराया;
हे भवानि! यह आपके दर्शन का ही महान् प्रभाव है।।
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नाहं भवो न च विरिञ्जि विवेद मातः
कोऽन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम्।
कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे
ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे।।
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हे माता! जब मैं (विष्णु), शिव तथा ब्रह्मा भी आपके अपूर्व चरित्र को जानने में समर्थ नहीं हैं, तब अन्य कोई कैसे जान सकेगा? हे महिमामयी भवानि! आपके रचे हुए इस सृष्टिप्रपंच में न जाने कितने लोक भरे पडे हैं।।
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अस्माभिरत्र भुवने हरिरन्य एव
दृष्टः शिवः कमलजः प्रथितप्रभावः।
अन्येषु देवि भुवनेषु न सन्ति किं ते
किं विद्म देवि विततं तव सुप्रभावम्।।
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हमलोगों ने आपके इस लोक में अद्भुत प्रभाववाले दूसरे विष्णु, शिव तथा ब्रह्मा को देखा है। हे देवि! क्या वे देवता अन्यान्य लोकों में नहीं होगे? हमलोग आपकी इस अद्भुत एवं व्यापक महिमा को कैसे जान सकते है?।।
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याचेऽम्ब तेऽड्घ्रिकमलं प्रणिपत्य कामं
चित्ते सदा वसतु रुपमिदं तवैतत्।
नामापि वक्त्रकुहरे सततं तवैव
संदर्शनं तव पदाम्बुजयोः सदैव।।
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हे जगदम्बा! मैं आपके चरणों में मस्तक नवाकर यही वरदान माँगता हूं की आपका यह दिव्य स्वरुप मेरे ह्रदय में सदा विराजमान रहें, मेरे मुखरुपी गुहा से निरन्तर आपका ही नाम निकले और मुझे सदैव आपके चरणकमलों के दर्शन होते रहें।।
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भृत्योऽमस्ति सततं मयि भावनीयं
त्वां स्वामिनीति मनसा ननु चिन्तयामि।
एषाऽऽवयोरविरता किल देवि भूया-
द्वयाप्तिः सदैव जननीसुतयोरिवार्ये।।
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हे माता! आपकी यह भावना मेरे प्रति सदा बनी रहें की यह मेरा सेवक हैं और में भी सर्वथा आपको मन से अपनी स्वामिनी समझता रहूँ। हे आर्ये! इस प्रकार मेरा और आपका माता-पुत्र के रुप में समबन्ध नित्य बना रहें।।
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त्वं वेत्सि सर्वमखिलं भुवनप्रपञ्चं
सर्वज्ञता परिसमाप्तिनितान्तभूमिः।
किं पामरेण जगदम्ब निवेदनीयं
यद्युक्तमाचर भवानि तवेगिंतं स्यात्।।
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हे जगदम्बिके! आप समस्त ब्रह्माण्डप्रपंचको पूर्णरुप से जानती हैं; क्योंकि जहाँ सर्वज्ञता की समाप्ति होती है, उसकी अंतिम सीमा आप ही हैं। हे भवानी! मैं पामर जीव कह ही क्या सकता हूँ? आपको जो उचित्त लगे, आप वह करें; क्योंकि सब कुछ तो आपही के संकेत पर होता है।।
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ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरुमापतिश्च
संहारकारक इयं तु जने प्रसिद्धः।
किं सत्यमेतदपि देवि तवेच्छया वै
कर्तुं क्षमा वयमजे तव शक्तियुक्ताः।।
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जगत् में ऐसी प्रसिद्धि है कि ब्रह्मा सृष्टि करते है, विष्णु पालन करते है और रुद्र संहार करते हैं, किन्तु हे देवि! क्या यह बात सत्य है? हे अजे! सत्य तो यह है कि आपकी इच्छा से तथा आपसे शक्ति प्राप्त कर हम अपना-अपना कार्य करने में समर्थ हो पाते हैं।।
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धात्री धराधरसुते न जगद्  बिभर्ति
आधारशक्तिरखिलं तव वै बिभर्ति।
सूर्योऽपि भाति वरदे प्रभया युतस्ते
त्वं सर्वमेतदखिलं विरजा विभासि।।
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हे गिरिजे! यह पृथ्वी इस जगत् को धारण नहीं करती है अपितु आपकी आधारशक्ति ही समस्त जगत् को धारण करती है। हे वरदे! भगवान सूर्य भी आपके ही आलोक से युक्त होकर प्रकाशमान हैं, इस प्रकार आप विरुजारुप से इस सम्पूर्ण जगत् के रुप में सुशोभित हो रही हैं।।
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ब्रह्माऽहमीश्वरवरः किल ते प्रभावा-
त्सर्वे वयं जनियुता न यदा तु नित्याः।
केऽन्ये सुराः शतमखप्रमुखाश्च नित्या
नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा।।
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ब्रह्मा, मैं (विष्णु) तथा श्रेष्ठ शंकर-हम सब निश्चय ही आपके प्रभाव से उत्पन्न होते हैं। जब हम नित्य नहीं हैं तो फिर इन्द्र आदि प्रमुख देवता कैसे नित्य हो सकते हैं? सम्पूर्ण चलाचर जगत् की जननी तथा सनातन प्रकृतिरुपा आप ही नित्य है।।
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त्वं चेद्भवानि दयसे पुरुषं पुराणं
जानेऽहमद्य तव सन्निधिगः सदैव।
नोचेदहं विभुरनादिरनीह ईशो
विश्वात्मधीरिति तमःप्रकृतिः सदैव।।
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हे भवानी! आपकी सन्निधि में आनेपर आज मुझे ज्ञात हो गया कि आप मुझ पुराणपुरुष पर सर्वदा दयाभाव बनाये रखती है; अन्यथा मैं अपने को सर्वव्यापी, आदिरहित, निष्काम, ईश्वर तथा विश्वात्मा बुद्धिवाला मान बैठता और सदा के लिये तमोगुणी प्रकृतिवाला हो जाता।।
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विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां
शक्तिस्त्वमेव किल शक्तिमतां सदैव।
त्वं कीर्तिकान्तिकमलामलतुष्टिरुपा
मुक्तिप्रदा विरतिरेव मनुष्यलोके।।
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आप निश्चय ही सदा से बुद्धिमान् पुरुषों की विद्या तथा शक्तिशाली पुरुषों की शक्ति हैं। आप कीर्ति, कान्ति, लक्ष्मी तथा निर्मल तुष्टि स्वरुपा हैं और इस मनुष्यलोक में आप ही मोक्ष प्रदान करनेवाली विरक्तिस्वरुपा हैं।।
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गायत्र्यसि प्रथमवेदकला त्वमेव
स्वाहा स्वधा भगवती सगुणार्धमात्रा।
आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्या
सञ्जीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम्।।
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आप ही वेदों की प्रथम कला गायत्री हैं। आप ही स्वाहा, स्वधा, सगुणा तथा अर्धमात्रा भगवती हैं। आपने ही देवताओं और पूर्वजों के संरक्षण के लिये आगम तथा निगम का विधान किया हैं।।
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मोक्षार्थमेव रचयस्यखिलं प्रपञ्चं
तेषां गताः खलु यतो ननु जीवभावम्।
अंशा अनादिनिधनस्य किलानधस्य
पूर्णार्णवस्य वितता हि यथा तरंगाः।।
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जिस प्रकार पूर्ण महासमुद्र की विस्तृत तरंगे उस समुद्र का ही अंश होती हैं, उसी प्रकार आदि-अन्त से हीन निष्कलंक ब्रह्म के अंश ही जीवभाव को प्राप्त होते हैं; उन्हें मोक्ष प्राप्त कराने के उद्देश्य से ही आपने सम्पूर्ण जगत्-प्रपंच का निर्माण किया हैं।।
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जीवो यदा तु परिवेत्ति तवैव कृत्यं
त्वं संहरस्यखिलमेतदिति प्रसिद्धम्।
नाट्यं नटेन रचितं वितथेऽन्तरंगे
कार्ये कृते विरमसे प्रथितप्रभावा।।
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सम्पूर्ण विश्वप्रपंच आपका ही कृत्य है और आप ही उसका संहार भी करती हैं-इस प्रसिद्ध तथ्य को जब जीव जान लेता हैं तब उसके इस विवेकज्ञान को देखकर व्यापक प्रभाववाली आप उसी प्रकार उपशम को प्राप्त होती हैं, जिस प्रकार अपने द्वारा रचित मिथ्या किन्तु चमत्कारपूर्ण नाट्य पर नट संतोष प्राप्त करता है।।
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त्राता त्वमेव मम मोहमयाद्भवाब्धे
स्त्वामम्बिके सततमेमि महार्तिदे च।
रागादिभिर्विरचिते वितथे किलान्ते
मामेव पाहि बहुदुःखकरे च काले।।
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हे अम्बिके! आप ही इस मोहमय भवसागर से मेरी रक्षा कर सकती हैं। राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों से उत्पन्न अत्यन्त कष्टदायक तथा महान् दुःखप्रद मिथ्यारुप अन्तकाल में मेरी रक्षा कीजियेगा, मैं सदा आपकी शरण में हूँ।।
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नमो देवि महाविद्ये नमामि चरणौ तव।
सदा ज्ञानप्रकाशं मे देहि सर्वार्थदे शिवे।।
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हे देवि! आपको नमस्कार हैं। हे महाविद्ये! मैं आपके चरणों में बार-बार नमन करता हूँ। हे सर्वार्थदायिनी शिवे! आप मुझे सदा ज्ञानरुपी प्रकाश प्रदान कीजिये।।
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।इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे तृतीयस्कन्धे विष्णुना कृतं देवीस्तोत्रं सम्पुर्णम्।
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